मृत शरीर के नाक-कान में क्यों लगाते हैं रुई? गरुड़ पुराण में छिपा है चौंकाने वाला रहस्य
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर के 10 द्वार खुले रह जाते हैं। आत्मा इन्हीं द्वारों से बाहर निकलती है। रुई लगाकर इन द्वारों को बंद किया जाता है ताकि शरीर अपवित्र न हो और कीड़े-मकोड़े अंदर प्रवेश न करें। मान्यता है कि इससे प्राण वायु का निकास पूरी तरह बंद हो जाता है और बुरी आत्माएं शरीर में प्रवेश नहीं कर पातीं। वैज्ञानिक रूप से इससे शरीर से निकलने वाला रक्त-द्रव्य बाहर नहीं आता और शव अंतिम संस्कार तक पवित्र रहता है।

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद किए जाने वाले हर एक रिवाज के पीछे गहरा धार्मिक और वैज्ञानिक रहस्य छिपा है। आपने अक्सर देखा होगा कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसके नाक, कान और कभी-कभी मुंह में रुई लगा दी जाती है। कई लोग इसे सिर्फ एक परंपरा मानते हैं, लेकिन गरुड़ पुराण में इसका बहुत ही गहरा और चौंकाने वाला रहस्य बताया गया है। आखिर क्यों किया जाता है ऐसा? गरुड़ पुराण हिंदू धर्म के 18 महापुराणों में से एक है, जिसे मृत्यु, आत्मा की यात्रा और परलोक का ग्रंथ कहा जाता है। इसमें भगवान विष्णु ने अपने वाहन गरुड़ जी को मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता है, यह विस्तार से बताया है।
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर 10 द्वारों से प्राण छोड़ता है - दो आंखें, दो कान, दो नासिका, मुंह, गुदा द्वार, मूत्र द्वार और ब्रह्मरंध्र (सिर के ऊपर का हिस्सा)। जब आत्मा शरीर छोड़ती है तो ये द्वार खुले रह जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद शरीर अपवित्र और अशुद्ध हो जाता है। खुली नाक-कान से शरीर के अंदर बाहरी बैक्टीरिया, कीड़े-मकोड़े और नकारात्मक शक्तियां प्रवेश कर सकती हैं। आत्मा अभी भी कुछ समय तक शरीर के आसपास ही भटकती है और वह नहीं चाहती कि उसके शरीर का अनादर हो। इसलिए रुई लगाकर शरीर के पवित्र द्वारों को बंद किया जाता है, ताकि शरीर को पवित्र बनाए रखा जा सके अंतिम संस्कार तक।
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ देर तक शरीर में सूक्ष्म प्राण वायु बची रहती है। नाक और कान से वायु का आना-जाना होता है। रुई लगाने का अर्थ है कि अब इस शरीर में वायु का कोई लेन-देन नहीं रहा, यानी अब शरीर पूरी तरह से निष्प्राण हो चुका है। यह इस बात का संकेत है कि आत्मा ने इस शरीर को हमेशा के लिए त्याग दिया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ देर तक शरीर में सूक्ष्म प्राण वायु बची रहती है। नाक और कान से वायु का आना-जाना होता है। रुई लगाने का अर्थ है कि अब इस शरीर में वायु का कोई लेन-देन नहीं रहा, यानी अब शरीर पूरी तरह से निष्प्राण हो चुका है। यह इस बात का संकेत है कि आत्मा ने इस शरीर को हमेशा के लिए त्याग दिया है।
दूसरा, मृत्यु के तुरंत बाद शरीर में दुर्गंध आने लगती है और कीड़े-मकोड़े आकर्षित होते हैं। नाक-कान में रुई लगाने से कीड़े शरीर के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते। यह शव को अंतिम यात्रा तक सुरक्षित रखने का एक प्राचीन और वैज्ञानिक तरीका था। गरुड़ पुराण में प्रेत बाधा का भी जिक्र है। कहा जाता है कि खुला शरीर देखकर अतृप्त आत्माएं और नकारात्मक शक्तियां उसमें प्रवेश करने की कोशिश करती हैं। रुई लगाकर शरीर के सभी द्वार बंद कर दिए जाते हैं ताकि मृत शरीर किसी बुरी शक्ति का माध्यम न बन सके और आत्मा शांति से यमलोक की यात्रा कर सके। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने यह परंपरा बनाई थी, जो आज भी बिना किसी सवाल के निभाई जा रही है। यह सिर्फ रुई नहीं, बल्कि मृत शरीर के सम्मान और आत्मा की शांतिपूर्ण विदाई का प्रतीक है।
विषय




